करें तो क्या करें हम भी शिकायत इस जमानेसे,
धुआँ उठता रहा है खुद हमारे आशियानेसे ।
धुआँ उठता रहा है खुद हमारे आशियानेसे ।
लगी थी चोट ऐसी भी नहीं मालूम था लेकिन,
सुना है आईना रोया हमारे टूट जानेसे ।
गिला तुमसे नहीं लोगो हमेंं क्यों आजमाया है,
हमारे अपने भी रूके कहाँ थे आजमानेसे।
पता भी तो नहीं था ये महोब्बत मौत लायेगी,
खतम हो जायेगी दुनिया जरासा दिल लगानेसे।
न आना चाहिये "आनंद" उनको याद करनेमे,
उदासी रूठ जाती है कभी भी मुस्कुरानेसे ।
विनोद नगदिया (आनंद )
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